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अंधकार से प्रकाश की ओर जाने की प्रेरणा देते है पयुर्षण – पूज्या मुक्तिप्रभाजी म.सा

सौरभ खेमसरा

मेघनगर  — जिनशासन गौरव आचार्य श्री उमेशमुनिजी की शिष्या एवं प्रवर्तक श्री जिनेन्द्रमुनिजी की आज्ञानुवर्तिनी विदुषी पूज्या मुक्तिप्रभाजी म.सा. ने पयूर्षण पर्व के प्रथम दिवस अणु स्वाध्याय भवन पर विशाल धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि संसार में दो प्रमुख विचारधाराएँ चलती है । एक यह है कि जीव स्वयं अपना विकास नहीं कर सकता है। जीव के विकास के लिये शक्तियाँ अवतरित होती है जो विकास करवाती है। दूसरी , जीव या आत्मा स्वयं अपना विकास कर सकता है। सुदेव सुगुरू और सुधर्म की सहायता मिलती है । साधक धर्म आराधना करते है। पर्युषण को पर्व कहते है जो तप त्याग के साथ मनाये जाते है जबकि त्यौहार में तीन की हार (हानि) होती है। धन की , तन की और समय की । पयुर्षण पर्व कृष्ण पक्ष में प्रारम्भ होकर शुक्ल पक्ष में पूर्ण होते है अतः अंधकार से प्रकाश की ओर जाने की प्रेरणा देते है। सभी को यथासंभव धर्माराधना करने का लक्ष्य रखना चाहिए ।

इस प्रसंग पर पूज्या प्रशमप्रभाजी ने कहा कि पर्यूषण पर्व की आराधना करते हुए राग-द्वेष का वमन ,कषायों का शमन एवं इन्दियों का दमन करना है तभी आत्मविकास संभव है। खाने – पीने से कभी घबराहट हो तो वमन करने की स्थिति आती है ,वैसे ही आत्मा मैं राग ,द्वेष व कषाय से घबराहट हो तो उनका वमन करने का विचार आना चाहिये अर्थात इनको आत्मा से बाहर निकालने का प्रयास होगा तो ही आत्मा कर्म से हल्की बनेगी । हल्की वस्तु उपर जाती है वैसे ही आत्मा को ऊपर उठाना है तो हल्की बनाना पड़ेगी। पूज्या महासती शमप्रभाजी ने पर्यूषण पर्व की स्थानकवासी परम्परा के अनुसार अंतगढ दशांग सूत्र का मार्मिक वांचन करते हुए कहा कि अन्तकृत अर्थात केवलज्ञान होते ही भवान्त की क्रिया करने वाले । इन आठ दिनो की विशिष्ट आराधना करके हमको अज्ञान रूपी अंधकार से ज्ञान रूपी प्रकाश की ओर अग्रसर होना है । धर्म सभा में कई श्रावक श्राविकाओं ने तप त्याग के प्रत्याख्यान लिये। उल्लेखनीय है कि श्रीसंघ में पचास के अधिक तपाराधक धर्मचक्र की आराधना कर रहे है जिनके तप का समापन 27 अगस्त को होगा । धर्मसभा की प्रभावना का लाभ विनोद कुमार बाफना परिवार ने लिया एव संचालन विपुल धोका ने किया ।

Navinata Akhbaar
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