झाबुआदेशमध्यप्रदेशव्यापार

दो गायों से शुरू हुआ सफर, आज बनीं लाखों की आय वाली प्रगतिशील गौपालक

आचार्य विद्यासागर गौ-संवर्धन योजना ने श्रीमती अर्चना पाटीदार के सपनों को दी नई उड़ान

झाबुआ । ग्रामीण भारत की असली ताकत उसकी मेहनत, आत्मविश्वास और आत्मनिर्भरता की भावना में बसती है। जब इन गुणों को शासन की योजनाओं का सहयोग मिल जाता है, तब साधारण किसान भी सफलता का ऐसा इतिहास रच देते हैं, जो पूरे समाज के लिए प्रेरणा बन जाता है। झाबुआ जिले के पेटलावद विकासखंड के ग्राम बावड़ी की श्रीमती अर्चना धर्मेन्द्र पाटीदार इसकी जीवंत मिसाल हैं। कभी केवल दो दुधारू गायों से अपने परिवार की आजीविका चलाने वाली अर्चना आज आधुनिक डेयरी प्रबंधन, वैज्ञानिक पशुपालन और एकीकृत कृषि प्रणाली के माध्यम से प्रतिमाह डेढ़ से दो लाख रुपये तक की आय अर्जित कर रही हैं।

गतिविधि क्षेत्र : योजना से मिली नई दिशा

12 सदस्यीय संयुक्त परिवार की जिम्मेदारियों के बीच वर्ष 2012 में श्रीमती अर्चना ने हरियाणा से दो संकर एचएफ दुधारू गाय खरीदकर डेयरी व्यवसाय की शुरुआत की। प्रतिदिन लगभग 20 लीटर दूध का उत्पादन होता था, जिसे साँची दुग्ध समिति में विक्रय किया जाता था। सीमित आय के कारण परिवार की आवश्यकताओं की पूर्ति करना चुनौतीपूर्ण था, लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी। वर्ष 2022-23 में उन्हें आचार्य विद्यासागर गौ-संवर्धन योजना का लाभ प्राप्त हुआ और यहीं से उनके जीवन में बदलाव का नया अध्याय शुरू हुआ।

वित्तीय सहायता : सपनों को मिला संबल

योजना के अंतर्गत 3.80 लाख रुपये की इकाई लागत पर 95 हजार रुपये का शासकीय अनुदान प्राप्त हुआ। इस सहायता से उन्होंने हरियाणा से पाँच उन्नत संकर एचएफ गायें खरीदीं। यही वह अवसर था जिसने छोटे डेयरी व्यवसाय को आधुनिक एवं व्यावसायिक डेयरी फार्म में बदलने की मजबूत नींव रखी।

गतिविधि हस्तक्षेप : वैज्ञानिक पशुपालन से मिली नई पहचान

श्रीमती अर्चना ने आधुनिक तकनीकों को अपनाते हुए गायों का सेक्स सॉर्टेड सीमन से कृत्रिम गर्भाधान कराया, जिससे उच्च गुणवत्ता वाली मादा बछियों का उत्पादन हुआ। आज उनके डेयरी फार्म में लगभग 20 व्यस्क दुधारू गायें एवं 20 उन्नत नस्ल की मादा बछियां हैं। नियमित देखभाल और वैज्ञानिक प्रबंधन के कारण दूध उत्पादन बढ़कर 180 से 200 लीटर प्रतिदिन तक पहुँच गया है।

पोषण आहार : बेहतर देखभाल से बढ़ा उत्पादन

पहले पशुओं को केवल भूसा और सामान्य पशु आहार दिया जाता था। अब साइलेज, सुदाना पशु आहार, मिनरल मिक्सचर तथा पूरे वर्ष नेपियर घास खिलाई जाती है। इस वैज्ञानिक पोषण व्यवस्था से दूध उत्पादन में 20 से 30 प्रतिशत तक वृद्धि हुई तथा उत्पादन लागत में लगभग 2 रुपये प्रति लीटर की कमी आई।

आधुनिक तकनीक का उपयोग : गुणवत्ता और उत्पादन दोनों में सुधार

दूध दोहन के लिए मिल्किंग मशीन के उपयोग ने उनके डेयरी फार्म को नई पहचान दी। इससे दूध की गुणवत्ता बेहतर हुई, उत्पादन में वृद्धि हुई और पशुओं में थनेला रोग की संभावना भी कम हो गई। आधुनिक तकनीक ने उनके श्रम को भी काफी हद तक आसान बनाया।

उन्नत नस्ल की गायों की उपलब्धता : अब बनीं दूसरों के लिए प्रेरणा

ब्रीडर एसोसिएशन की सदस्य के रूप में श्रीमती अर्चना कम लागत पर उच्च गुणवत्ता वाली मादा बछियां तैयार कर रही हैं। लगभग 45 हजार रुपये की लागत से तैयार होने वाली बछियां 14 से 16 माह बाद लगभग 1.50 लाख रुपये तक में विक्रय होती हैं। इससे उन्हें अतिरिक्त आय प्राप्त होने के साथ अन्य पशुपालकों को भी स्थानीय स्तर पर उन्नत नस्ल की गायें उपलब्ध हो रही हैं।

गौमूत्र एवं गोबर का सदुपयोग : पर्यावरण संरक्षण का अनूठा उदाहरण

उनके डेयरी फार्म में संसाधनों का उत्कृष्ट प्रबंधन देखने को मिलता है। गौमूत्र एवं शेड के वेस्टेज वाटर का उपयोग खेतों की सिंचाई में किया जाता है, जबकि गोबर से निर्मित बायोगैस से पूरे परिवार का भोजन तैयार होता है। बायोगैस से प्राप्त स्लरी एवं गोबर खाद खेतों में जैविक उर्वरक के रूप में उपयोग की जाती है। इससे खेती की लागत कम होने के साथ पर्यावरण संरक्षण को भी बढ़ावा मिला है।

आय के अन्य स्रोत : एकीकृत कृषि प्रणाली से बढ़ी समृद्धि

डेयरी व्यवसाय के साथ उन्होंने उद्यानिकी विभाग के सहयोग से पॉलीहाउस में टमाटर एवं मिर्च की पौध तैयार करना तथा खीरा एवं ककड़ी का उत्पादन प्रारंभ किया, जिससे प्रतिवर्ष 6 से 8 लाख रुपये की अतिरिक्त आय प्राप्त होती है। इसके अलावा मक्का एवं सोयाबीन की खेती भी उनकी आय का मजबूत आधार है।

योजनाओं से जुड़ने के बाद वित्तीय स्थिति : आत्मनिर्भरता की ओर मजबूत कदम

एक समय ऐसा था जब उनकी मासिक आय लगभग 40 हजार रुपये थी, लेकिन आज विभिन्न कृषि एवं पशुपालन गतिविधियों से उनकी मासिक आय 1.50 से 2 लाख रुपये तक पहुँच चुकी है। उन्होंने दो स्थानीय युवाओं को रोजगार भी उपलब्ध कराया है, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिली है।

आर्थिक, सामाजिक एवं शैक्षणिक स्थिति में सुधार : सफलता के नए आयाम

बेहतर आर्थिक स्थिति के कारण उन्होंने अपनी पुत्री को कोटा में नीट की तैयारी के लिए भेजा है तथा पुत्र को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए निजी छात्रावास में अध्ययनरत रखा है। आज वे क्षेत्र की सफल महिला पशुपालक के रूप में सम्मानित पहचान बना चुकी हैं।

दूसरे किसानों के लिए बनीं प्रेरणा

श्रीमती अर्चना की सफलता से प्रेरित होकर आसपास के अनेक किसान आधुनिक एवं वैज्ञानिक पशुपालन अपनाने लगे हैं। उनका डेयरी फार्म आज क्षेत्र के पशुपालकों के लिए सीखने और प्रेरणा लेने का केंद्र बन गया है।

भविष्य की कार्ययोजना : आत्मनिर्भर पशुपालन की नई सोच

अब उनका लक्ष्य केवल स्वयं आगे बढ़ना नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र के पशुपालकों को आत्मनिर्भर बनाना है। वे साइलेज निर्माण को बढ़ावा देने तथा स्वयं साइलेज मशीन स्थापित कर अन्य गौपालकों को कम लागत पर उपलब्ध कराने की दिशा में कार्य करना चाहती हैं।

आचार्य विद्यासागर गौ-संवर्धन योजना ने श्रीमती अर्चना पाटीदार के जीवन में केवल आर्थिक समृद्धि ही नहीं लाई, बल्कि उन्हें आत्मनिर्भरता, सम्मान और नेतृत्व की नई पहचान भी दी है। उनकी कहानी इस बात का प्रमाण है कि यदि किसान आधुनिक तकनीक, वैज्ञानिक सोच और शासन की योजनाओं का समुचित लाभ उठाएँ, तो गौपालन केवल पारंपरिक व्यवसाय नहीं, बल्कि समृद्धि, रोजगार और ग्रामीण विकास का सशक्त माध्यम बन सकता है।

Navinata Akhbaar
IMG_1778519643904

Related Articles

Back to top button
error: Content is protected !!