जिसके हृदय में नवकार होता है वह आत्मा पड़पंच में नही पड़ती, ऐसा पुण्य सम्राटश्री कहते थे – सा.श्री तत्वलताश्रीजी

सौरभ खेमसरा
झाबुआ – मेघनगर चातुर्मासकाल के अंतर्गत श्रावण सुद 7 से श्रावण सुद 15 तक 09 दिवसीय श्री नमस्कार महामंत्र आराधना का आयोजन किया जाता है। पूज्य पुण्य सम्राट श्रीमद विजय जयंतसेन सुरीश्वरजी महाराजा ने आराधना की सर्वप्रथम शुरुआत निंबाहेड़ा से प्रारंभ की थी, और इस आराधना ने राणापुर से सामूहिक स्वरूप लिया और प्रतिवर्ष हजारों आराधक सामूहिक आराधना से जुड़ने लगे। 9 दिवसीय इस आराधना के नियम पुण्य सम्राट ने बनाए थे, सामूहिक देववंदन, श्वेत वस्त्र, 20 पक्की नवकार माला, एकाशना, आदि क्रिया इसमें करना जरूरी होती है। नवकार आराधना के दूसरे दिन नमो सिद्धाण` पद के बारे में समझाते हुए पूज्य साध्वीजी ने बताया कि हमारे गुरुदेव पुण्य सम्राट कहते थे कि विधि से आराधना करने वालो को ही नवकार की प्राप्त होता है, जो मन को शुद्ध रखकर और सिर्फ और सिर्फ नवकार से जुड़ता है, नवकार उसके हृदय में बस जाता है, और जिसके हृदय में नवकार बस जाए फिर वो आत्मा दुनिया के पड़पंच में नही पड़ती है, वो सिर्फ अपनी आत्मा का कल्याण कर सिद्ध गति की ओर अग्रसर हो जाती है। इसलिए हमे भी अपने भावो को शुद्ध रखकर आराधना करना है। साथ ही पूज्य साध्वीजी ने फरमाया कि पुण्य सम्राट ने 2004 में बाग चातुर्मास में 01 माह की मौन साधना की थी और इस दौरान पूज्यश्री ने नवकार मंत्र के 68 अक्षर पर 68 तीर्थों की भावयात्रा की सुंदर रचना की, जिसके माध्यम से हम भावो से ही इन 68 तीर्थों की स्पर्शना कर सकते है। पुण्य सम्राट ने इन 68 अक्षर पर आए तीर्थों का 1 स्थान पर 1 तीर्थ बनाने का स्वप्न भी देखा था, जो आज पूरा होने जा रहा है, राजस्थान के जालोर जिले के मोदरान ग्राम के समीप 68 अक्षर तीर्थधाम का निर्माण चल रहा है, जो कि बहुत शीघ्र पूर्ण भी होने वाला है। उक्त जानकारी देते हुए रजत कावड़िया ने बताया कि 40 से अधिक आराधकों के सोमवार को आराधना के दूसरे दिन के एकाशने संपन्न हुए। नमस्कार महामंत्र आराधना के लाभार्थी श्रीमती शिरोमणीदेवी समरथमलजी रूनवाल परिवार द्वारा सभी आराधकों की अनुमोदना भी की गई। साथ ही कावड़िया ने बताया कि सामूहिक भद्रतप एवं सिद्धितप के तपस्वियों का अब 4 उपवास की लड़ी का बियाशना दिनांक 15 अगस्त को संपन्न होगा।





