नवचक्र आराधना में तपस्वियों ने पहले उपवास के किये पारणें
परिग्रह की मर्यादा से बहुत पाप छुट सकते है - धर्मन्द्रमुनिजी

कषायों का संतुलन भी घातक है – धर्मेन्द्रमुनि
थांदला । संसार में हर जीव सुख चाहता है परंतु सुखी कोई भी नहीं है इसका कारण जानने की आवश्यकता है। परम भोग के स्वामी चक्रवर्ती राजा भी सुख पाने के लिये भोग-सामग्री का त्याग कर देते है। मतलब साफ है कि सुख भोग में नहीं अपितु त्याग में है। उक्त धर्म प्रेरक प्रवचन तत्त्वज्ञ पूज्य श्री धर्मेन्द्रमुनिजी ने अणु संदेश का आलंबन लेते हुए धर्म सभा में कहे। तत्वज्ञश्री ने क्रोध आने के कारणों में से एक बड़प्पन के विषय पर प्रकाश डालते हुए कहा कि जीव को जब गरज नहीं होती है तो वह अपने आप को बड़ा समझने लगता है और उसका यह बड़ा बनने की सोच कषायों को जन्म देती है। आपश्री ने कहा जैसे बारीश से हरियाली आती है और हरियाली से बारीश होती है बस वैसे ही इच्छाओं को महत्व देने से क्रोध आता है और क्रोध आदि कषायों के कारण इच्छा उत्पन्न होती है जिससे संसार बढ़ता है। तत्वज्ञश्री ने साधुत्व को परिभाषित करते हुए कहा कि समस्त पापों का त्याग ही साधुत्व है, संसारी अवस्था में तो 94% पाप लगे ही रहते है। यदि जीव परिगृह की मर्यादा कर ये तो उसके पापों में कमी आ सकती है। आपने कहा आत्मा में पड़ी कर्म सत्ता के उदय भाव से कषायों का जोर प्रायः रहता है, परंतु ज्ञान दृष्टि उपशम भाव से उसमें शांत रहना सिखाती है। आपने कहा कि जीव के हाथ में जो परीस्थिती नहीं है, वहाँ भी उसे क्रोध और चिड़चिड़ापन आता है परंतु गम्भीरता से सोचे तो उसे लगेगा कि इससे तो वह स्वयं का ही नुकसान कर रहा है। आपने धर्म सभा में अणु संदेश का सार फरमाते हुए कहा कि आत्मदृष्टि से सोचे की अपने को बड़ा समझने, अपनी इच्छाओं को महत्व देने से अथवा अकारण ही क्रोध या चिढ़चिढ़ापन आता है तो इनके विपरीत भाव याने अपने को छोटा समझो, इच्छाओं को महत्व मत दो और चिढ़चिदापन दूर करने का उद्यम करना ही श्रेयस्कर है। आपने कहा कि डाक्टर वात-पित्त-कफ के असंतुलन को ठीक कर बिमारी का ईलाज करता है परन्तु कषायों का संतुलन भी घातक होकर संसार बढ़ाने वाला होता है अतः इसका तो पूरा समाप्त होना ही आवश्यक है।

भोग त्याग उत्तम जो प्रत्याख्यान से महान फलदायी – रोचक वक्ता
प्रत्याख्यान ग्रहण करने के लाभ बताते हुए रोचक वक्ता पूज्य श्री संदीपमुनिजी ने फरमाया कि जीव पच्चख्खाण को ग्रहण करता है तो वह आश्रव द्वारों व इच्छाओं का निरोध करता है जिससे वह तृष्णा से रहित होकर शांति से विचरण करता है। आपने कहा कि राजनीति में राष्ट्रपति हो या प्रधानमंत्री अथवा कोई नेता ही क्यों न हो जब वह जीत जाता है तो उसे शपथ दिलाई जाती है तभी उसे वैधानिक मान्यता मिलती है वैसे ही जैसे आध्यात्म जगत में भी जीव के लिये भोग का त्याग उत्तम है परंतु उसकी शपथ उसे महान फलदायी बनाती है। आपने रोचक अंदाज में कहा कि जैसे शपथ में सार तत्व रूप शब्दों को क्रम से पड़ा जाता है वैसे ही संकल्प की विधि व शब्दों का ज्ञान परम आवश्यक है जो नियमिय अभ्यास से आता है। आपने पर्युषण में धर्म आराधना को जाने वालें स्वाध्यायियों को हित शिक्षा देते हुए कहा कि पच्चख्खाण में महज छू नही करें वहाँ उसे उपयोग सहित सही क्रम से होना चाहिए अन्यथा तो दोष अपना ही है जो सही नही है। आपने पच्चख्खाण की दुर्लभता बताते हुए कहा संसार में स्थान व क्षेत्र की अपेक्षा से देखे तो महाविदेह क्षेत्र को छोड़ दिया जाए तो भरत – ऐरावत क्षेत्र के एक अवसर्पिणी के 10 क्रोड़ा-क्रोड़ी सागरोपम् जितने बड़े काल में भी 9 क्रोड़ा-क्रोड़ी सागरोपम से भी अधिक समय व्रत-पच्चक्खाण का नही है, फिर चार गतियों में भी देव तीन दिन में आहार लेते है फिर भी उनको संकल्प पूर्वक एक नवकारसी जितना लघु तप भी नही है, मनुष्य गति में भी प्रायः अधिक क्षेत्र में व्रत पच्चख्खाण का प्रायः आभाव ही है वही जीव को प्रायः मोबाइल चलाने, चाय, तंबाकू आदि व्यसन व घूमने-फिरने आदि की लत उसे व्रत प्रत्याख्यान लेने में बाधक बनती है परंतु वह दृढ़ संकल्प से इन्हें छोड़ सकता है। आपने कहा जीव इन बाहरी व्यसन, विषय विकार आदि वृत्तियों को छोड़ेगा तभी वह अपने आंतरिक राग-द्वेष रूपी कषाय का त्याग कर पायेगा ऐसे में जिन्हें यह सहज मिला है उसे इसकी दुर्लभता समझना चाहिए व व्रत पच्चख्खाण से अपने तप को निर्मल बनाना चाहिए।
नन्दचक्र की आराधना का पहला पारणा
पूज्य श्री धर्मेन्द्रमुनिजी ने आगम में भव्य जीवों के विपुल कर्म निर्जरा में तप के महत्व को देखते हुए संघ की भावना अनुरूप नन्दचक्र की उत्तम आराधना की विधि बतलाई जिसमें तपस्वी को एक उपवास पारणा, फिर क्रमशः दो, चार व आठ उपवास करते हुए पारणा व फिर उतरते क्रम में पुनः चार, दो व एक उपवास करना होते है जिसमें तप के 22 दिन व 7 पारणें के दिन इस तरह 29 दिन की आराधना की भव्य जनों को प्रेरणा दी। रोचक वक्ता ने तप के साथ दर्शन आराधना का क्रम बनाते हुए इस तप में 21 माला णमो अरिहंताणं की, 12 लोगस्स का ध्यान, 12 णमोत्थुणम, 12 वंदना करने के साथ चारित्र आराधना में इस तप में सचित का त्याग, ब्रम्हश्चर्य का पालन व रात्रि चौविहार करने की प्रेरणा दी। जानकारी देते हुए संघ अध्यक्ष प्रदीप गादिया व प्रवक्ता पवन नाहर ने बताया कि गुरुदेव की प्रेरणा को शिरोधार्य करते हुए 50 के करीब तपस्वियों ने 25 जुलाई को उपवास तप की आराधना से इसकी शुरुआत कर दी है जिसका आज प्रातः नवकारसी समय पर स्थानीय महावीर भवन पर पारणा करवाया गया। समस्त वर्षीतप आराधकों व नन्दचक्र आराधकों के सामूहिक पारणें का लाभ स्व. सुशीला देवी पटवा के जन्मदिन के उपलक्ष्य में अलका सुनील पटवा उज्जैन वालों कि ओर से करवाये गए वही नीलेश माणकलाल पटवा ने तपस्वियों की व नन्ही परी ईहा अनुलेश श्रीश्रीमाल के जन्मदिन के उपलक्ष्य अनुपमा मंगलेश श्रीश्रीमाल ने प्रवचन प्रभावना का लाभ लिया सकल आयोजन का संचालन श्रीसंघ अध्यक्ष प्रदीप गादिया व सचिव हितेश शाहजी के मार्गदर्शन में हुआ।






